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Mujhe Kehta Jagat Pagal | Hindi Motivational Poem on Society, Problems and Issues

By April 20, 2018 No Comments
Mujhe kehta jagat pagal Hindi motivational and inspirational poem

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A Hindi motivational Poem on society

Dosto ye poem mere pitaji ne 1989 me likkhi thi jab vo apni zindagi me struggle kar rahe the, kuch khaas karne ko tha nahi. Padhe likhe aur educated hone ke baad bhi koi khas success hath nahi lag rahi thi. Mere papa by heart ek poet bhi the aur Hindi me poetry kiya karte the.
Mai aap logo se ye kavita share kar raha hoon umeed karta hoon aap logo ko pasand aayegi.

मुझे कहता जगत पागल सखे, मैं गीत गाता हूँ।
कि पीकर जिन्दगी के राग ईर्ष्या द्वेष मद मत्सर
विचरता मस्त पथ पर गुनगुनाता डगमगाता हूँ।
मुझे कहता जगत पागल शराबी मत्त मायावी
कि यह अभिव्यक्ति का अधिकार उनका है
मगर मैं गीत गाता हूँ।

नहीं सौन्दर्य है इसमें नहीं श्रृंगार का पुट है,
गलित ज्वाला अतल से निकल शब्दों को सजाती है।
अनल में घोल कर विष वारूणी अद्भुत बनाता मैं,
मिला कर राग का रस, भाव का मकरन्द
स्वर की सर्करा के संग,
शब्दों को सजा कर
रचा करता छन्द।
मैं कवि हूँ सखे
कविता सुनाता हूँ।
मुझे कहता जगत पागल सखे मैं गीत गाता हूँ।

सुना अल्लाह ने कब्जा किया भगवान के घर को
किसी ने तोड़ कर मन्दिर वहाँ मस्जिद बनाया था।
कि उस दिन क्रुद्ध उत्तेजित, जनों का महत् वृहत समूह
धुनते माथ, मलते हाथ
घृणा से किटकिटाते दाँत
हिंसा का प्रबल संकल्प
मन में लिए आया था।

समझ पाता नहीं मैं धर्म की इस गूढ़ता को
अन्ध मनुसंतान की इस मूढ़ता को,
स्तब्ध
किंचित चेतना से हीन सा हो कर
व्यथित व्याकुल हुआ जब चित्त
आहें आँसुओं सँग मिलीं बने कवित्त
ज्वाला और जल के समागम से।
आज अपना दर्द वह गाकर सुनाता हूँ।
मुझे कहता जगत पागल सखे मैं गीत गाता हूँ।

वृहत बाजार है दुनिया, सभी सामान बिकते हैं।
सुना है कौड़ियों के भाव में इंसान बिकते हैं।
नियम सिद्धान्त तो कब के यहाँ पर बिक चुके सारे,
कि अब तो बिक रही इज्जत यहाँ ईमान बिकते हैं।
बिकाऊ है यहाँ पर
ज्ञान, गरिमा, और गौरव
सत्य, शुचिता, नीति, निष्ठा, सौख्य, सौरभ,
छल प्रपंचों को मिला दर्जा कला का,
मूल्य जीवन के हुए सब लुप्त
हो कर कुटिलता से युक्त
मानव चुन रहा है स्वयं निज आदर्श रावण, कंस को।

और कहते हैं
नए युग की नई तकनीक
है परिणाम यह विज्ञान के उत्थान का।
मूढ़मति मैं समझ पाता नहीं जब कुछ भी
कभी बेचैन हो कर चीखता हूँ
या कभी चुप बैठ जाता हूँ।
मुझे कहता जगत पागल सखे मैं गीत गाता हूँ।

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